Mansarovar in Hindi: Volume 1
Hardcover
• 172 Pages
• INR 345.00
• Hindi
• 9789387669086
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9789387669086 |
| ASIN/SKU | 9387669084 |
| Book Format | Hardcover |
| Language | Hindi |
| Pages | 172 |
| List Price | INR 345.00 |
| Subject Code | FIC019000, POE000000, FOR007000 |
| Publishing Date | 01/01/2018 |
| Dimensions | 8.25 x 5.25 x 1.0 inches |
| Book Code | BD00068005 |
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Discover Mansarovar in Hindi: Volume 1 by Premchand. This book is published by General Press in Hardcover format, ISBN 9789387669086, ASIN 9387669084, under Literature and Fiction, Indian Writing, Short Stories.
Book Description
"कहते हैं जिसने प्रेमचंद नहीं पढ़ा उसने हिन्दुस्तान नहीं पढ़ा।"
प्रेमचंद ने 14 उपन्यास व 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण कहानियों को 'मानसरोवर' में संजोकर प्रस्तुत किया है। इनमें से अनेक कहानियाँ देश-भर के पाठ्यक्रमों में समाविष्ट हुई हैं, कई पर नाटक व फ़िल्में बनी हैं जब कि कई का भारतीय व विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
अपने समय और समाज का ऐतिहासिक संदर्भ तो जैसे प्रेमचंद की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है। उनकी कहानियों में अनेक मनोवैज्ञानिक बारीक़ियाँ भी देखने को मिलती हैं। विषय को विस्तार देना व पात्रों के बीच में संवाद उनकी पकड़ को दर्शाते हैं। ये कहानियाँ न केवल पाठकों का मनोरंजन करती हैं बल्कि उत्कृष्ट साहित्य समझने की दृष्टि भी प्रदान करती हैं।
ईदगाह, नमक का दारोगा, पूस की रात, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, पंच-परमेश्वर, आदि अनेक ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें पाठक कभी नहीं भूल पाएँगे।
प्रेमचंद ने 14 उपन्यास व 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण कहानियों को 'मानसरोवर' में संजोकर प्रस्तुत किया है। इनमें से अनेक कहानियाँ देश-भर के पाठ्यक्रमों में समाविष्ट हुई हैं, कई पर नाटक व फ़िल्में बनी हैं जब कि कई का भारतीय व विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
अपने समय और समाज का ऐतिहासिक संदर्भ तो जैसे प्रेमचंद की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है। उनकी कहानियों में अनेक मनोवैज्ञानिक बारीक़ियाँ भी देखने को मिलती हैं। विषय को विस्तार देना व पात्रों के बीच में संवाद उनकी पकड़ को दर्शाते हैं। ये कहानियाँ न केवल पाठकों का मनोरंजन करती हैं बल्कि उत्कृष्ट साहित्य समझने की दृष्टि भी प्रदान करती हैं।
ईदगाह, नमक का दारोगा, पूस की रात, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, पंच-परमेश्वर, आदि अनेक ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें पाठक कभी नहीं भूल पाएँगे।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा,
लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरता जा रहा था। इसी के चलते 8 अक्तूबर, 1936 को क़लम के इस सिपाही ने सब से विदा ले ली।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा,
लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरता जा रहा था। इसी के चलते 8 अक्तूबर, 1936 को क़लम के इस सिपाही ने सब से विदा ले ली।
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Book Summary
मुंशी प्रेमचंद की ‘मानसरोवर भाग 1’ हिंदी साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण कहानी-संग्रहों में से एक है। इसमें प्रेमचंद ने भारतीय समाज के सामान्य मनुष्य—किसान, मजदूर, गरीब, स्त्री, बच्चा, कर्मचारी और परिवार के साधारण सदस्यों—के जीवन को इतनी सहजता और संवेदना से प्रस्तुत किया है कि उनकी कहानियाँ आज भी उतनी ही जीवंत लगती हैं। अलग-अलग संस्करणों और संकलनों में कहानियों का चयन और क्रम कुछ भिन्न मिल सकता है; आपके बताए संस्करण में ‘ईदगाह’, ‘पूस की रात’, ‘नमक का दरोगा’, ‘गरीब की हाय’, ‘सुजान भगत’, ‘रामलीला’, ‘धोखा’, ‘जुगनू की चमक’, ‘बेटों वाली विधवा’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘घरजमाई’, ‘दरोगाजी’, ‘कफन’ और ‘दो भाई’ जैसी रचनाएँ प्रमुख हैं। प्रेमचंद की कहानियों की व्यापक सूची और ‘मानसरोवर’ के संस्करणों में भिन्नता भी उपलब्ध ऑनलाइन संकलनों में दिखाई देती है।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रेमचंद कहानी को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते। उनके लिए कहानी समाज और मनुष्य को समझने का रास्ता है। वे गरीबी को केवल पैसों की कमी नहीं मानते, बल्कि उसे आत्मसम्मान, रिश्तों और निर्णयों को प्रभावित करने वाली परिस्थिति के रूप में देखते हैं। इसी तरह ईमानदारी, प्रेम, त्याग, लालच, अन्याय और पारिवारिक संबंध उनके पात्रों के जीवन में वास्तविक संघर्ष बनकर आते हैं।
‘ईदगाह’ इस संग्रह की सबसे मार्मिक कहानियों में से एक है। इसका केंद्र छोटा बच्चा हामिद है, जो अपनी दादी अमीना के साथ रहता है। ईद के दिन दूसरे बच्चे मेले में खिलौने, मिठाइयाँ और दूसरी चीजें खरीदने के लिए उत्साहित हैं, लेकिन हामिद के पास बहुत कम पैसे हैं। मेले में वह अपनी इच्छा पर नियंत्रण रखकर दादी के लिए चिमटा खरीदता है, क्योंकि वह जानता है कि रोटी बनाते समय उनके हाथ जल जाते हैं। इस छोटी-सी घटना में प्रेमचंद ने बाल-मन की असाधारण संवेदनशीलता दिखाई है। हामिद के लिए चिमटा खिलौने से अधिक मूल्यवान है क्योंकि उसमें दादी के प्रति प्रेम छिपा है। ‘ईदगाह’ का मूल कथानक हामिद के मनोभावों और परिस्थितियों के सूक्ष्म चित्रण पर आधारित है।
‘पूस की रात’ किसान जीवन की गरीबी और विवशता का अत्यंत मार्मिक चित्र है। हल्कू एक गरीब किसान है जिसे कर्ज चुकाने के लिए अपनी बची हुई रकम देनी पड़ती है। परिणाम यह होता है कि उसके पास कड़ाके की ठंड से बचने के लिए पर्याप्त साधन नहीं रहते। रात में वह अपने कुत्ते जबरा के साथ खेत की रखवाली करता है। ठंड इतनी भयंकर है कि खेती की रखवाली करना उसके लिए लगभग असंभव हो जाता है। अंततः खेत का नुकसान भी होता है, लेकिन उस क्षण पाठक को हल्कू के भीतर एक विचित्र राहत दिखाई देती है—कम-से-कम अब उसे ऐसी ठंडी रात में खेत पर नहीं बैठना पड़ेगा। कहानी किसान की उस विडंबना को सामने लाती है जिसमें मेहनत करने वाला व्यक्ति अपनी ही मेहनत का सुख नहीं पा पाता। मूल कहानी में हल्कू का कर्ज और ठंड के बीच संघर्ष इसी सामाजिक यथार्थ को सामने रखता है।
‘नमक का दरोगा’ ईमानदारी और भ्रष्ट व्यवस्था के बीच संघर्ष की कहानी है। वंशीधर नमक विभाग में दरोगा बनता है और नौकरी के आरंभ में ही उसे रिश्वत की दुनिया का सामना करना पड़ता है। पंडित अलोपीदीन प्रभावशाली और धनवान व्यक्ति है, जो गैरकानूनी नमक व्यापार में शामिल है। वंशीधर उसे पकड़ लेता है और भारी रिश्वत के प्रस्ताव के बावजूद अपना कर्तव्य नहीं छोड़ता। बाद में परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि ईमानदार अधिकारी को नुकसान और प्रभावशाली व्यक्ति को लाभ मिलता दिखाई देता है। फिर भी कहानी का नैतिक केंद्र वंशीधर की ईमानदारी ही रहती है। यह कहानी औपनिवेशिक समय की उस व्यवस्था पर भी टिप्पणी करती है जिसमें कानून और धन के प्रभाव के बीच संघर्ष दिखाई देता है।
‘गरीब की हाय’ में गरीबी, अन्याय और शोषित व्यक्ति की पीड़ा प्रमुख है। प्रेमचंद गरीब मनुष्य को केवल दया का पात्र नहीं बनाते, बल्कि उसकी पीड़ा को नैतिक प्रश्न में बदल देते हैं। गरीब पर किया गया अन्याय केवल उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता; उसकी पीड़ा समाज की अंतरात्मा पर भी प्रश्न खड़ा करती है। कहानी यह समझाती है कि आर्थिक शक्ति के आधार पर किसी कमजोर व्यक्ति के अधिकारों को कुचलना अंततः सामाजिक और मानवीय पतन का संकेत है।
‘सुजान भगत’ में एक ऐसे व्यक्ति का चित्र मिलता है जो जीवन भर परिश्रम और प्रतिष्ठा के बाद भी बदलती परिस्थितियों में अपने परिवार और समाज के भीतर अपनी भूमिका को नए सिरे से महसूस करता है। प्रेमचंद यहाँ उम्र, सम्मान, आत्मसम्मान और पारिवारिक संबंधों की बारीकियों को सामने रखते हैं। कहानी का महत्व इस बात में है कि यह बताती है कि मनुष्य की असली गरिमा धन या सामाजिक पद में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और नैतिकता में होती है।
‘रामलीला’ में धार्मिक उत्सव, बचपन और सामाजिक जीवन की स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं। प्रेमचंद धार्मिक वातावरण को केवल आस्था की दृष्टि से नहीं देखते; वे यह भी दिखाते हैं कि रामलीला जैसे सामुदायिक आयोजन बच्चों और सामान्य लोगों के मन पर किस तरह प्रभाव डालते हैं। इसमें बचपन की कल्पना, आकर्षण और उस समय के सामाजिक वातावरण की झलक मिलती है। प्रेमचंद के लिए ऐसे प्रसंग भारतीय समाज की सामूहिक संस्कृति को समझने का माध्यम हैं।
‘धोखा’ मनुष्य की धारणा और वास्तविकता के बीच अंतर को सामने लाती है। हम अक्सर किसी व्यक्ति या परिस्थिति को बाहरी रूप से देखकर उसके बारे में निर्णय बना लेते हैं, लेकिन वास्तविकता उससे बिल्कुल अलग हो सकती है। प्रेमचंद इस विरोधाभास का इस्तेमाल यह बताने के लिए करते हैं कि मनुष्य के निर्णयों में जल्दबाजी और पूर्वधारणाएँ कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं।
‘जुगनू की चमक’ में अंधकार के बीच छोटी-सी रोशनी आशा और जीवन की संभावना का प्रतीक बनती है। प्रेमचंद के साहित्य में साधारण वस्तुएँ और छोटी घटनाएँ अक्सर गहरे अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। जुगनू की मामूली चमक इसी तरह मनुष्य के भीतर मौजूद उम्मीद की ओर संकेत करती है। जीवन चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, आशा की छोटी-सी किरण भी मनुष्य को आगे बढ़ने की शक्ति दे सकती है।
‘बेटों वाली विधवा’ परिवार और स्त्री की असुरक्षित स्थिति पर केंद्रित मार्मिक कहानी है। विधवा होने के बाद जिस स्त्री को अपने बेटों से सुरक्षा और सहारा मिलने की उम्मीद होती है, वही पारिवारिक स्वार्थ और बदलते व्यवहार के कारण अकेली पड़ सकती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह सवाल उठाते हैं कि परिवार वास्तव में किस आधार पर टिकता है—रक्त-संबंध पर, संपत्ति पर या सच्चे स्नेह पर? कहानी में स्त्री की भावनात्मक और सामाजिक असुरक्षा विशेष रूप से उभरती है।
‘दो बैलों की कथा’ प्रेमचंद की सबसे प्रसिद्ध पशु-कथाओं में से है। हीरा और मोती केवल दो बैल नहीं हैं; वे मित्रता, स्वामीभक्ति, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के प्रतीक बन जाते हैं। झूरी के साथ उनका गहरा संबंध है। जब उन्हें दूसरे स्थान पर भेजा जाता है, वे कठिन परिस्थितियों और अत्याचार के बावजूद अपने पुराने घर और अपने प्रिय स्वामी की ओर लौटने की कोशिश करते हैं। कहानी में पशुओं के माध्यम से मनुष्य के समाज पर भी टिप्पणी की गई है। दोनों बैलों की मित्रता और स्वतंत्रता की इच्छा कहानी को अत्यंत मानवीय बना देती है।
‘बड़े भाई साहब’ शिक्षा, अनुशासन और भाईचारे की मनोरंजक कहानी है। बड़ा भाई पढ़ाई को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानता है और छोटे भाई को लगातार समझाता रहता है। छोटा भाई खेलना अधिक पसंद करता है, फिर भी वह परीक्षा में सफल हो जाता है। बड़े भाई की कठोरता के पीछे उसका स्नेह और जिम्मेदारी छिपी है। प्रेमचंद यहाँ शिक्षा की रटंत व्यवस्था पर हल्का व्यंग्य करते हुए यह भी दिखाते हैं कि जीवन की समझ केवल किताबों से नहीं आती। दोनों भाइयों का रिश्ता कहानी को हास्य के साथ गहरी आत्मीयता देता है।
‘घरजमाई’ में पारिवारिक संबंधों के भीतर आर्थिक निर्भरता, सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता के समीकरण सामने आते हैं। घरजमाई होना केवल पारिवारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और आत्मसम्मान से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। प्रेमचंद सामान्य घरेलू परिस्थितियों के भीतर छिपे तनाव को हास्य और व्यंग्य के साथ प्रस्तुत करते हैं।
‘दरोगाजी’ में सरकारी पद, अधिकार और सामाजिक व्यवहार के बीच संबंध दिखाई देता है। प्रेमचंद पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था के पात्रों को केवल पद के आधार पर महान या खलनायक नहीं बनाते। वे यह दिखाते हैं कि अधिकार मिलने के बाद मनुष्य का व्यवहार कैसे बदल सकता है और समाज पदाधिकारी से किस तरह प्रभावित होता है। इस प्रकार कहानी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ मनुष्य के चरित्र की भी पड़ताल करती है।
‘कफन’ प्रेमचंद की सबसे कठोर और विवादास्पद सामाजिक कहानियों में से है। घीसू और माधव अत्यंत गरीब हैं और काम से बचने की आदत के कारण समाज की दृष्टि में पहले से ही निंदित हैं। माधव की पत्नी बुधिया प्रसव पीड़ा में तड़पती रहती है, जबकि दोनों पिता-पुत्र बाहर बैठे रहते हैं। अंततः बुधिया की मृत्यु हो जाती है। गांव वाले कफन के लिए पैसे देते हैं, लेकिन घीसू और माधव उन पैसों से कफन खरीदने के बजाय शराब और भोजन पर खर्च कर देते हैं। कहानी को केवल पिता-पुत्र की संवेदनहीनता के रूप में पढ़ना अधूरा होगा। प्रेमचंद यहाँ ऐसी गरीबी और सामाजिक व्यवस्था की भयावहता दिखाते हैं जिसने मनुष्य के भीतर से श्रम, आशा और नैतिक विश्वास तक को क्षीण कर दिया है। ‘कफन’ पाठक को यह कठिन प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करती है कि अपराध केवल घीसू और माधव का है या उस व्यवस्था का भी जिसने उन्हें इस स्थिति तक पहुँचाया।
‘दो भाई’ में भाईचारे, पारिवारिक संबंधों और स्वार्थ के बीच पैदा होने वाले तनाव को सामने रखा गया है। प्रेमचंद के लिए परिवार केवल प्रेम का स्थान नहीं, बल्कि अधिकार, जिम्मेदारी और संपत्ति से जुड़े संघर्षों का भी केंद्र है। भाई-भाई के रिश्ते में जब स्वार्थ प्रवेश करता है तो वर्षों का अपनापन भी कमजोर पड़ सकता है। फिर भी प्रेमचंद के पात्रों में सुधार और आत्मबोध की संभावना समाप्त नहीं होती।
इन सभी कहानियों को एक साथ देखें तो ‘मानसरोवर भाग 1’ का सबसे बड़ा विषय मनुष्य और उसकी परिस्थितियों का संबंध दिखाई देता है। ‘ईदगाह’ में गरीबी के बावजूद प्रेम बचा रहता है; ‘पूस की रात’ में गरीबी मनुष्य को थका देती है; ‘नमक का दरोगा’ में ईमानदारी व्यवस्था से टकराती है; ‘दो बैलों की कथा’ में पशुओं के माध्यम से स्वतंत्रता और आत्मसम्मान सामने आते हैं; और ‘कफन’ में गरीबी की चरम अवस्था मनुष्य की नैतिक चेतना को ही विकृत कर देती है।
प्रेमचंद की भाषा इन कहानियों को विशेष रूप से प्रभावशाली बनाती है। वह सरल, बोलचाल के करीब और भावनात्मक है। वे बड़े सामाजिक प्रश्नों को छोटे प्रसंगों में समेटते हैं। किसी गरीब किसान की ठंडी रात, बच्चे का मेले में जाना, दो बैलों का अपने घर लौटना या एक सरकारी कर्मचारी का रिश्वत ठुकराना—इन छोटी घटनाओं के माध्यम से प्रेमचंद समाज की बड़ी तस्वीर सामने रख देते हैं।
‘मानसरोवर भाग 1’ का सार केवल यह नहीं है कि इसमें गरीब और दुखी लोगों की कहानियाँ हैं। इसका वास्तविक महत्व यह है कि प्रेमचंद अपने पात्रों के माध्यम से मनुष्य की गरिमा, कमजोरी, प्रेम, स्वार्थ, त्याग और सामाजिक विवशता को समझने का अवसर देते हैं। उनकी कहानियाँ पाठक को किसी आसान निष्कर्ष तक नहीं ले जातीं। वे अक्सर ऐसे प्रश्न छोड़ देती हैं जिनका उत्तर पाठक को स्वयं तलाशना पड़ता है।
कुल मिलाकर, ‘मानसरोवर भाग 1’ प्रेमचंद की श्रेष्ठ कहानियों को समझने और हिंदी साहित्य में उनके यथार्थवादी दृष्टिकोण को जानने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। ‘ईदगाह’ का हामिद, ‘पूस की रात’ का हल्कू, ‘नमक का दरोगा’ का वंशीधर, ‘दो बैलों की कथा’ के हीरा-मोती और ‘कफन’ के घीसू-माधव—ये सभी पात्र अलग-अलग दुनिया से आते हुए भी एक साझा प्रश्न उठाते हैं: कठिन परिस्थितियों में मनुष्य आखिर कितना बदल जाता है, और उसके भीतर की मानवता कहाँ तक बची रहती है? यही प्रश्न इस संग्रह को केवल पुराना हिंदी कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक मानवीय साहित्य बनाता है।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रेमचंद कहानी को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते। उनके लिए कहानी समाज और मनुष्य को समझने का रास्ता है। वे गरीबी को केवल पैसों की कमी नहीं मानते, बल्कि उसे आत्मसम्मान, रिश्तों और निर्णयों को प्रभावित करने वाली परिस्थिति के रूप में देखते हैं। इसी तरह ईमानदारी, प्रेम, त्याग, लालच, अन्याय और पारिवारिक संबंध उनके पात्रों के जीवन में वास्तविक संघर्ष बनकर आते हैं।
‘ईदगाह’ इस संग्रह की सबसे मार्मिक कहानियों में से एक है। इसका केंद्र छोटा बच्चा हामिद है, जो अपनी दादी अमीना के साथ रहता है। ईद के दिन दूसरे बच्चे मेले में खिलौने, मिठाइयाँ और दूसरी चीजें खरीदने के लिए उत्साहित हैं, लेकिन हामिद के पास बहुत कम पैसे हैं। मेले में वह अपनी इच्छा पर नियंत्रण रखकर दादी के लिए चिमटा खरीदता है, क्योंकि वह जानता है कि रोटी बनाते समय उनके हाथ जल जाते हैं। इस छोटी-सी घटना में प्रेमचंद ने बाल-मन की असाधारण संवेदनशीलता दिखाई है। हामिद के लिए चिमटा खिलौने से अधिक मूल्यवान है क्योंकि उसमें दादी के प्रति प्रेम छिपा है। ‘ईदगाह’ का मूल कथानक हामिद के मनोभावों और परिस्थितियों के सूक्ष्म चित्रण पर आधारित है।
‘पूस की रात’ किसान जीवन की गरीबी और विवशता का अत्यंत मार्मिक चित्र है। हल्कू एक गरीब किसान है जिसे कर्ज चुकाने के लिए अपनी बची हुई रकम देनी पड़ती है। परिणाम यह होता है कि उसके पास कड़ाके की ठंड से बचने के लिए पर्याप्त साधन नहीं रहते। रात में वह अपने कुत्ते जबरा के साथ खेत की रखवाली करता है। ठंड इतनी भयंकर है कि खेती की रखवाली करना उसके लिए लगभग असंभव हो जाता है। अंततः खेत का नुकसान भी होता है, लेकिन उस क्षण पाठक को हल्कू के भीतर एक विचित्र राहत दिखाई देती है—कम-से-कम अब उसे ऐसी ठंडी रात में खेत पर नहीं बैठना पड़ेगा। कहानी किसान की उस विडंबना को सामने लाती है जिसमें मेहनत करने वाला व्यक्ति अपनी ही मेहनत का सुख नहीं पा पाता। मूल कहानी में हल्कू का कर्ज और ठंड के बीच संघर्ष इसी सामाजिक यथार्थ को सामने रखता है।
‘नमक का दरोगा’ ईमानदारी और भ्रष्ट व्यवस्था के बीच संघर्ष की कहानी है। वंशीधर नमक विभाग में दरोगा बनता है और नौकरी के आरंभ में ही उसे रिश्वत की दुनिया का सामना करना पड़ता है। पंडित अलोपीदीन प्रभावशाली और धनवान व्यक्ति है, जो गैरकानूनी नमक व्यापार में शामिल है। वंशीधर उसे पकड़ लेता है और भारी रिश्वत के प्रस्ताव के बावजूद अपना कर्तव्य नहीं छोड़ता। बाद में परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि ईमानदार अधिकारी को नुकसान और प्रभावशाली व्यक्ति को लाभ मिलता दिखाई देता है। फिर भी कहानी का नैतिक केंद्र वंशीधर की ईमानदारी ही रहती है। यह कहानी औपनिवेशिक समय की उस व्यवस्था पर भी टिप्पणी करती है जिसमें कानून और धन के प्रभाव के बीच संघर्ष दिखाई देता है।
‘गरीब की हाय’ में गरीबी, अन्याय और शोषित व्यक्ति की पीड़ा प्रमुख है। प्रेमचंद गरीब मनुष्य को केवल दया का पात्र नहीं बनाते, बल्कि उसकी पीड़ा को नैतिक प्रश्न में बदल देते हैं। गरीब पर किया गया अन्याय केवल उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता; उसकी पीड़ा समाज की अंतरात्मा पर भी प्रश्न खड़ा करती है। कहानी यह समझाती है कि आर्थिक शक्ति के आधार पर किसी कमजोर व्यक्ति के अधिकारों को कुचलना अंततः सामाजिक और मानवीय पतन का संकेत है।
‘सुजान भगत’ में एक ऐसे व्यक्ति का चित्र मिलता है जो जीवन भर परिश्रम और प्रतिष्ठा के बाद भी बदलती परिस्थितियों में अपने परिवार और समाज के भीतर अपनी भूमिका को नए सिरे से महसूस करता है। प्रेमचंद यहाँ उम्र, सम्मान, आत्मसम्मान और पारिवारिक संबंधों की बारीकियों को सामने रखते हैं। कहानी का महत्व इस बात में है कि यह बताती है कि मनुष्य की असली गरिमा धन या सामाजिक पद में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और नैतिकता में होती है।
‘रामलीला’ में धार्मिक उत्सव, बचपन और सामाजिक जीवन की स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं। प्रेमचंद धार्मिक वातावरण को केवल आस्था की दृष्टि से नहीं देखते; वे यह भी दिखाते हैं कि रामलीला जैसे सामुदायिक आयोजन बच्चों और सामान्य लोगों के मन पर किस तरह प्रभाव डालते हैं। इसमें बचपन की कल्पना, आकर्षण और उस समय के सामाजिक वातावरण की झलक मिलती है। प्रेमचंद के लिए ऐसे प्रसंग भारतीय समाज की सामूहिक संस्कृति को समझने का माध्यम हैं।
‘धोखा’ मनुष्य की धारणा और वास्तविकता के बीच अंतर को सामने लाती है। हम अक्सर किसी व्यक्ति या परिस्थिति को बाहरी रूप से देखकर उसके बारे में निर्णय बना लेते हैं, लेकिन वास्तविकता उससे बिल्कुल अलग हो सकती है। प्रेमचंद इस विरोधाभास का इस्तेमाल यह बताने के लिए करते हैं कि मनुष्य के निर्णयों में जल्दबाजी और पूर्वधारणाएँ कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं।
‘जुगनू की चमक’ में अंधकार के बीच छोटी-सी रोशनी आशा और जीवन की संभावना का प्रतीक बनती है। प्रेमचंद के साहित्य में साधारण वस्तुएँ और छोटी घटनाएँ अक्सर गहरे अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। जुगनू की मामूली चमक इसी तरह मनुष्य के भीतर मौजूद उम्मीद की ओर संकेत करती है। जीवन चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, आशा की छोटी-सी किरण भी मनुष्य को आगे बढ़ने की शक्ति दे सकती है।
‘बेटों वाली विधवा’ परिवार और स्त्री की असुरक्षित स्थिति पर केंद्रित मार्मिक कहानी है। विधवा होने के बाद जिस स्त्री को अपने बेटों से सुरक्षा और सहारा मिलने की उम्मीद होती है, वही पारिवारिक स्वार्थ और बदलते व्यवहार के कारण अकेली पड़ सकती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह सवाल उठाते हैं कि परिवार वास्तव में किस आधार पर टिकता है—रक्त-संबंध पर, संपत्ति पर या सच्चे स्नेह पर? कहानी में स्त्री की भावनात्मक और सामाजिक असुरक्षा विशेष रूप से उभरती है।
‘दो बैलों की कथा’ प्रेमचंद की सबसे प्रसिद्ध पशु-कथाओं में से है। हीरा और मोती केवल दो बैल नहीं हैं; वे मित्रता, स्वामीभक्ति, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के प्रतीक बन जाते हैं। झूरी के साथ उनका गहरा संबंध है। जब उन्हें दूसरे स्थान पर भेजा जाता है, वे कठिन परिस्थितियों और अत्याचार के बावजूद अपने पुराने घर और अपने प्रिय स्वामी की ओर लौटने की कोशिश करते हैं। कहानी में पशुओं के माध्यम से मनुष्य के समाज पर भी टिप्पणी की गई है। दोनों बैलों की मित्रता और स्वतंत्रता की इच्छा कहानी को अत्यंत मानवीय बना देती है।
‘बड़े भाई साहब’ शिक्षा, अनुशासन और भाईचारे की मनोरंजक कहानी है। बड़ा भाई पढ़ाई को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानता है और छोटे भाई को लगातार समझाता रहता है। छोटा भाई खेलना अधिक पसंद करता है, फिर भी वह परीक्षा में सफल हो जाता है। बड़े भाई की कठोरता के पीछे उसका स्नेह और जिम्मेदारी छिपी है। प्रेमचंद यहाँ शिक्षा की रटंत व्यवस्था पर हल्का व्यंग्य करते हुए यह भी दिखाते हैं कि जीवन की समझ केवल किताबों से नहीं आती। दोनों भाइयों का रिश्ता कहानी को हास्य के साथ गहरी आत्मीयता देता है।
‘घरजमाई’ में पारिवारिक संबंधों के भीतर आर्थिक निर्भरता, सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता के समीकरण सामने आते हैं। घरजमाई होना केवल पारिवारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और आत्मसम्मान से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। प्रेमचंद सामान्य घरेलू परिस्थितियों के भीतर छिपे तनाव को हास्य और व्यंग्य के साथ प्रस्तुत करते हैं।
‘दरोगाजी’ में सरकारी पद, अधिकार और सामाजिक व्यवहार के बीच संबंध दिखाई देता है। प्रेमचंद पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था के पात्रों को केवल पद के आधार पर महान या खलनायक नहीं बनाते। वे यह दिखाते हैं कि अधिकार मिलने के बाद मनुष्य का व्यवहार कैसे बदल सकता है और समाज पदाधिकारी से किस तरह प्रभावित होता है। इस प्रकार कहानी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ मनुष्य के चरित्र की भी पड़ताल करती है।
‘कफन’ प्रेमचंद की सबसे कठोर और विवादास्पद सामाजिक कहानियों में से है। घीसू और माधव अत्यंत गरीब हैं और काम से बचने की आदत के कारण समाज की दृष्टि में पहले से ही निंदित हैं। माधव की पत्नी बुधिया प्रसव पीड़ा में तड़पती रहती है, जबकि दोनों पिता-पुत्र बाहर बैठे रहते हैं। अंततः बुधिया की मृत्यु हो जाती है। गांव वाले कफन के लिए पैसे देते हैं, लेकिन घीसू और माधव उन पैसों से कफन खरीदने के बजाय शराब और भोजन पर खर्च कर देते हैं। कहानी को केवल पिता-पुत्र की संवेदनहीनता के रूप में पढ़ना अधूरा होगा। प्रेमचंद यहाँ ऐसी गरीबी और सामाजिक व्यवस्था की भयावहता दिखाते हैं जिसने मनुष्य के भीतर से श्रम, आशा और नैतिक विश्वास तक को क्षीण कर दिया है। ‘कफन’ पाठक को यह कठिन प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करती है कि अपराध केवल घीसू और माधव का है या उस व्यवस्था का भी जिसने उन्हें इस स्थिति तक पहुँचाया।
‘दो भाई’ में भाईचारे, पारिवारिक संबंधों और स्वार्थ के बीच पैदा होने वाले तनाव को सामने रखा गया है। प्रेमचंद के लिए परिवार केवल प्रेम का स्थान नहीं, बल्कि अधिकार, जिम्मेदारी और संपत्ति से जुड़े संघर्षों का भी केंद्र है। भाई-भाई के रिश्ते में जब स्वार्थ प्रवेश करता है तो वर्षों का अपनापन भी कमजोर पड़ सकता है। फिर भी प्रेमचंद के पात्रों में सुधार और आत्मबोध की संभावना समाप्त नहीं होती।
इन सभी कहानियों को एक साथ देखें तो ‘मानसरोवर भाग 1’ का सबसे बड़ा विषय मनुष्य और उसकी परिस्थितियों का संबंध दिखाई देता है। ‘ईदगाह’ में गरीबी के बावजूद प्रेम बचा रहता है; ‘पूस की रात’ में गरीबी मनुष्य को थका देती है; ‘नमक का दरोगा’ में ईमानदारी व्यवस्था से टकराती है; ‘दो बैलों की कथा’ में पशुओं के माध्यम से स्वतंत्रता और आत्मसम्मान सामने आते हैं; और ‘कफन’ में गरीबी की चरम अवस्था मनुष्य की नैतिक चेतना को ही विकृत कर देती है।
प्रेमचंद की भाषा इन कहानियों को विशेष रूप से प्रभावशाली बनाती है। वह सरल, बोलचाल के करीब और भावनात्मक है। वे बड़े सामाजिक प्रश्नों को छोटे प्रसंगों में समेटते हैं। किसी गरीब किसान की ठंडी रात, बच्चे का मेले में जाना, दो बैलों का अपने घर लौटना या एक सरकारी कर्मचारी का रिश्वत ठुकराना—इन छोटी घटनाओं के माध्यम से प्रेमचंद समाज की बड़ी तस्वीर सामने रख देते हैं।
‘मानसरोवर भाग 1’ का सार केवल यह नहीं है कि इसमें गरीब और दुखी लोगों की कहानियाँ हैं। इसका वास्तविक महत्व यह है कि प्रेमचंद अपने पात्रों के माध्यम से मनुष्य की गरिमा, कमजोरी, प्रेम, स्वार्थ, त्याग और सामाजिक विवशता को समझने का अवसर देते हैं। उनकी कहानियाँ पाठक को किसी आसान निष्कर्ष तक नहीं ले जातीं। वे अक्सर ऐसे प्रश्न छोड़ देती हैं जिनका उत्तर पाठक को स्वयं तलाशना पड़ता है।
कुल मिलाकर, ‘मानसरोवर भाग 1’ प्रेमचंद की श्रेष्ठ कहानियों को समझने और हिंदी साहित्य में उनके यथार्थवादी दृष्टिकोण को जानने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। ‘ईदगाह’ का हामिद, ‘पूस की रात’ का हल्कू, ‘नमक का दरोगा’ का वंशीधर, ‘दो बैलों की कथा’ के हीरा-मोती और ‘कफन’ के घीसू-माधव—ये सभी पात्र अलग-अलग दुनिया से आते हुए भी एक साझा प्रश्न उठाते हैं: कठिन परिस्थितियों में मनुष्य आखिर कितना बदल जाता है, और उसके भीतर की मानवता कहाँ तक बची रहती है? यही प्रश्न इस संग्रह को केवल पुराना हिंदी कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक मानवीय साहित्य बनाता है।
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Mansarovar in Hindi: Volume 1
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