Mansarovar in Hindi: Volume 2
Hardcover
• 176 Pages
• INR 345.00
• Hindi
• 9789387669093
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9789387669093 |
| ASIN/SKU | 9387669092 |
| Book Format | Hardcover |
| Language | Hindi |
| Pages | 176 |
| List Price | INR 345.00 |
| Subject Code | FIC019000, POE000000, FOR007000 |
| Publishing Date | 01/01/2018 |
| Dimensions | 8.25 x 5.25 x 1.0 inches |
| Book Code | BD00068006 |
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Discover Mansarovar in Hindi: Volume 2 by Premchand. This book is published by General Press in Hardcover format, ISBN 9789387669093, ASIN 9387669092, under Literature and Fiction, Indian Writing, Short Stories.
Book Description
"कहते हैं जिसने प्रेमचंद नहीं पढ़ा उसने हिन्दुस्तान नहीं पढ़ा।"
प्रेमचंद ने 14 उपन्यास व 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण कहानियों को 'मानसरोवर' में संजोकर प्रस्तुत किया है। इनमें से अनेक कहानियाँ देश-भर के पाठ्यक्रमों में समाविष्ट हुई हैं, कई पर नाटक व फ़िल्में बनी हैं जब कि कई का भारतीय व विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
अपने समय और समाज का ऐतिहासिक संदर्भ तो जैसे प्रेमचंद की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है। उनकी कहानियों में अनेक मनोवैज्ञानिक बारीक़ियाँ भी देखने को मिलती हैं। विषय को विस्तार देना व पात्रों के बीच में संवाद उनकी पकड़ को दर्शाते हैं। ये कहानियाँ न केवल पाठकों का मनोरंजन करती हैं बल्कि उत्कृष्ट साहित्य समझने की दृष्टि भी प्रदान करती हैं।
ईदगाह, नमक का दारोगा, पूस की रात, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, पंच-परमेश्वर, आदि अनेक ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें पाठक कभी नहीं भूल पाएँगे।
प्रेमचंद ने 14 उपन्यास व 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण कहानियों को 'मानसरोवर' में संजोकर प्रस्तुत किया है। इनमें से अनेक कहानियाँ देश-भर के पाठ्यक्रमों में समाविष्ट हुई हैं, कई पर नाटक व फ़िल्में बनी हैं जब कि कई का भारतीय व विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
अपने समय और समाज का ऐतिहासिक संदर्भ तो जैसे प्रेमचंद की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है। उनकी कहानियों में अनेक मनोवैज्ञानिक बारीक़ियाँ भी देखने को मिलती हैं। विषय को विस्तार देना व पात्रों के बीच में संवाद उनकी पकड़ को दर्शाते हैं। ये कहानियाँ न केवल पाठकों का मनोरंजन करती हैं बल्कि उत्कृष्ट साहित्य समझने की दृष्टि भी प्रदान करती हैं।
ईदगाह, नमक का दारोगा, पूस की रात, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, पंच-परमेश्वर, आदि अनेक ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें पाठक कभी नहीं भूल पाएँगे।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरता जा रहा था। इसी के चलते 8 अक्तूबर, 1936 को क़लम के इस सिपाही ने सब से विदा ले ली।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरता जा रहा था। इसी के चलते 8 अक्तूबर, 1936 को क़लम के इस सिपाही ने सब से विदा ले ली।
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Book Summary
मुंशी प्रेमचंद की “मानसरोवर भाग 2” हिंदी साहित्य की उन कहानी-संकलनों में से है, जिनमें भारतीय समाज का जीवन अपनी पूरी सादगी, विडंबना, करुणा और मानवीयता के साथ दिखाई देता है। प्रेमचंद की कहानियाँ केवल घटनाएँ सुनाने के लिए नहीं लिखी गईं; वे मनुष्य के स्वभाव, सामाजिक असमानता, पारिवारिक संबंधों, न्याय, स्वार्थ, प्रेम, कर्तव्य और नैतिक संघर्ष को बहुत सहज भाषा में सामने लाती हैं। इस संस्करण में “पंच परमेश्वर”, “बड़े घर की बेटी”, “कजाकी”, “शतरंज के खिलाड़ी”, “बूढ़ी काकी”, “नशा”, “सज्जनता का दंड”, “आत्माराम”, “घासवाली”, “पिसनहारी का कुआँ”, “लाग-डाट”, “परीक्षा”, “क्रिकेट मैच” और “भाड़े का टट्टू” जैसी चर्चित कहानियाँ शामिल हैं। इस संस्करण की विषय-सूची भी इन्हीं कहानियों को मानसरोवर भाग 2 के रूप में प्रस्तुत करती है।
इस संग्रह को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात सामने आती है, वह है प्रेमचंद की मानवीय दृष्टि। उनके पात्र पूरी तरह अच्छे या बुरे नहीं होते। वे परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं, गलतियाँ करते हैं, स्वार्थी बनते हैं, पछताते हैं और कभी-कभी अपने भीतर छिपी अच्छाई को पहचान लेते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ पुराने समय की सामाजिक पृष्ठभूमि में होते हुए भी आज के पाठक को अपने आसपास की दुनिया से जुड़ी हुई लगती हैं।
“पंच परमेश्वर” इस संग्रह की सबसे प्रभावशाली कहानियों में से एक है। जुम्मन शेख और अलगू चौधरी गहरे मित्र हैं। दोनों के बीच धर्म या जाति से अधिक महत्वपूर्ण विश्वास और मित्रता है। लेकिन जब पंचायत में एक को दूसरे के विरुद्ध निर्णय देना पड़ता है, तो व्यक्तिगत संबंध और न्याय के बीच संघर्ष पैदा होता है। अलगू जब पंच बनता है तो जुम्मन के विरुद्ध निष्पक्ष फैसला देता है। बाद में जब जुम्मन को पंच बनने का अवसर मिलता है, तो वह भी मित्रता से ऊपर न्याय को रखता है। कहानी का मूल संदेश यह है कि पंच की कुर्सी पर बैठते ही मनुष्य को व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठना चाहिए। प्रेमचंद यहाँ ग्रामीण पंचायत के माध्यम से न्याय की नैतिक गरिमा को सामने रखते हैं।
“बड़े घर की बेटी” पारिवारिक संबंधों और समझदारी की कहानी है। आनंदी बड़े घर से आई हुई बहू है, लेकिन ससुराल की आर्थिक परिस्थितियाँ उसके मायके जैसी नहीं हैं। परिवार के छोटे-छोटे तनाव धीरे-धीरे विवाद में बदलते हैं और भाइयों के बीच मनमुटाव पैदा हो जाता है। आनंदी अपने व्यवहार और संयम से टूटते हुए परिवार को फिर जोड़ने की कोशिश करती है। प्रेमचंद बताते हैं कि घर को केवल धन नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और समझदारी भी संभालती है। कहानी में स्त्री को केवल घरेलू भूमिका में नहीं, बल्कि परिवार को जोड़ने वाली नैतिक शक्ति के रूप में देखा गया है।
“कजाकी” प्रेमचंद की करुण और भावुक कहानियों में गिनी जाती है। इसमें एक साधारण कर्मचारी और एक बच्चे के बीच विकसित होने वाला आत्मीय संबंध कहानी का केंद्र है। कजाकी आर्थिक रूप से साधारण व्यक्ति है, लेकिन उसके भीतर स्नेह, ईमानदारी और आत्मसम्मान की गहरी भावना है। कहानी यह दिखाती है कि सामाजिक हैसियत मनुष्य के हृदय की कीमत तय नहीं करती। प्रेमचंद छोटे आदमी के भीतर मौजूद बड़े मन को पहचानते हैं और पाठक को बताते हैं कि सच्ची इंसानियत पद और पैसे से कहीं बड़ी चीज है।
“शतरंज के खिलाड़ी” में प्रेमचंद व्यक्तिगत विलास और ऐतिहासिक पतन के बीच संबंध स्थापित करते हैं। मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली शतरंज खेलने में इतने डूबे हुए हैं कि उनके सामने बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का महत्व लगभग समाप्त हो जाता है। अवध के नवाब वाजिद अली शाह के शासन पर अंग्रेजी सत्ता का संकट मंडरा रहा है, लेकिन दोनों मित्र अपने खेल और निजी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। प्रेमचंद शतरंज के “राजा” को बचाने की कोशिश और वास्तविक राजनीतिक सत्ता के पतन के बीच एक तीखा व्यंग्य पैदा करते हैं। कहानी केवल दो आलसी सामंतों की कहानी नहीं है; यह उस मानसिकता की आलोचना है जिसमें व्यक्ति अपने निजी सुख में इतना डूब जाता है कि समाज और देश की बड़ी समस्याओं से आँखें फेर लेता है।
“बूढ़ी काकी” वृद्धावस्था, उपेक्षा और पारिवारिक संवेदनहीनता की मार्मिक कहानी है। बूढ़ी काकी ने अपनी संपत्ति रिश्तेदारों को दे दी, लेकिन उम्र बढ़ने के बाद वही लोग उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं। उन्हें भोजन और स्नेह जैसी बुनियादी चीजों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। कहानी में भूख केवल पेट की भूख नहीं है; यह सम्मान, अपनापन और प्रेम की भूख भी है। प्रेमचंद पाठक को यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि जिस बुजुर्ग ने जीवन भर परिवार के लिए दिया, उसके जीवन के अंतिम वर्षों में परिवार उसका कितना साथ देता है।
“नशा” मनुष्य के भीतर मौजूद सामाजिक अहंकार और वर्ग-बोध पर व्यंग्य करती है। कहानी का “नशा” केवल किसी पदार्थ का नहीं, बल्कि पद, प्रतिष्ठा और धन का नशा है। व्यक्ति जब अपने सामाजिक दर्जे को अपनी वास्तविक योग्यता समझने लगता है, तो उसका व्यवहार बदल जाता है। प्रेमचंद बड़ी सहजता से दिखाते हैं कि परिस्थितियाँ बदलते ही मनुष्य का वास्तविक चरित्र सामने आ जाता है। यह कहानी आज भी इसलिए प्रासंगिक लगती है क्योंकि आधुनिक समाज में भी पैसा, पद और सामाजिक प्रतिष्ठा व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
“सज्जनता का दंड” शीर्षक ही कहानी के व्यंग्य को स्पष्ट करता है। इसमें अच्छाई और ईमानदारी को हमेशा तत्काल पुरस्कार नहीं मिलता। कई बार सरल और सज्जन व्यक्ति ही चालाक लोगों का शिकार बन जाता है। प्रेमचंद इस विडंबना को उजागर करते हैं कि समाज में नैतिकता की बात करना आसान है, लेकिन वास्तव में सज्जन बने रहना कठिन। कहानी पाठक को यह प्रश्न देती है कि क्या ऐसी सामाजिक व्यवस्था उचित है जहाँ चालाकी सफल और ईमानदारी नुकसानदेह दिखाई देती है।
“आत्माराम” प्रेमचंद की हास्य और मानवीय स्वभाव से जुड़ी कहानियों में महत्वपूर्ण है। इसमें मनुष्य की इच्छाओं, कल्पनाओं और आत्म-संतोष की प्रवृत्ति को हल्के-फुल्के अंदाज में सामने लाया गया है। प्रेमचंद गंभीर सामाजिक विषयों के बीच हास्य का इस्तेमाल इसलिए करते हैं ताकि पाठक अपने ही व्यवहार को मुस्कराते हुए पहचान सके। कहानी का आनंद इसी बात में है कि इसमें उपदेश कम और जीवन की स्वाभाविक विडंबना अधिक दिखाई देती है।
“घासवाली” सामाजिक वर्ग, गरीबी और स्त्री के संघर्ष को केंद्र में रखती है। घास काटकर जीवन चलाने वाली स्त्री आर्थिक रूप से कमजोर है, लेकिन उसका आत्मसम्मान मजबूत है। प्रेमचंद गरीब पात्रों को दया के पात्र मात्र नहीं बनाते; वे उन्हें इच्छा, स्वाभिमान और निर्णय लेने की क्षमता वाले मनुष्य के रूप में चित्रित करते हैं। कहानी ग्रामीण समाज में आर्थिक और सामाजिक शक्ति के असंतुलन को उजागर करती है।
“पिसनहारी का कुआँ” त्याग और लोकहित की भावना की कहानी है। एक साधारण स्त्री की इच्छा और उसके परिश्रम से जुड़ा कुआँ आगे चलकर सामुदायिक उपयोग का प्रतीक बनता है। प्रेमचंद बताते हैं कि किसी व्यक्ति की सच्ची महानता उसकी संपत्ति में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसके जीवन से दूसरों को कितना लाभ मिला। यहाँ कुआँ केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि स्मृति, सेवा और मानवीय उदारता का प्रतीक बन जाता है।
“लाग-डाट” मानवीय प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और सामाजिक संबंधों की जटिलता को सामने लाती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि छोटी-सी बात कैसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाती है और लोग अपने अहंकार के कारण संबंधों को खराब कर बैठते हैं। कहानी में ग्रामीण जीवन की स्वाभाविक भाषा और व्यवहार के माध्यम से यह समझाया गया है कि मनुष्य अक्सर वास्तविक समस्या से अधिक अपने अहंकार की रक्षा करने में उलझा रहता है।
“परीक्षा” में नैतिकता और चरित्र की वास्तविक कसौटी सामने आती है। प्रेमचंद के लिए किसी व्यक्ति की अच्छाई उसके शब्दों से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थिति में किए गए उसके निर्णय से साबित होती है। जब स्वार्थ और कर्तव्य के बीच चुनाव करना पड़ता है, तभी चरित्र की असली परीक्षा होती है। यही विचार कहानी को केवल अपने समय की कथा न रहकर सार्वभौमिक मानवीय अनुभव बना देता है।
“क्रिकेट मैच” प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि का एक हल्का और व्यंग्यपूर्ण रूप प्रस्तुत करती है। आधुनिक खेल, सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावा और लोगों की मानसिकता कहानी में आपस में जुड़ते हैं। क्रिकेट यहाँ केवल खेल नहीं रहता; वह सामाजिक व्यवहार और नई संस्कृति के प्रभाव को देखने का माध्यम बन जाता है। प्रेमचंद हास्य के सहारे बताते हैं कि समाज किस तरह किसी नई चीज को अपनाते समय उसके वास्तविक अर्थ से अधिक उसके प्रदर्शन और प्रतिष्ठा पर ध्यान देने लगता है।
अंत में “भाड़े का टट्टू” व्यक्ति की उपयोगिता, स्वार्थ और सामाजिक व्यवहार की विडंबनाओं पर प्रकाश डालती है। “टट्टू” का रूपक ऐसे मनुष्य की ओर संकेत करता है जिसे दूसरे अपने उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करते हैं। कहानी में आर्थिक मजबूरी और सामाजिक संबंधों के बीच का तनाव दिखाई देता है। प्रेमचंद फिर वही सवाल उठाते हैं—क्या मनुष्य की कीमत उसके व्यक्तित्व से तय होती है या इस बात से कि वह दूसरों के कितने काम आ सकता है?
समग्र रूप से “मानसरोवर भाग 2” प्रेमचंद की कहानी-कला का ऐसा संसार है जहाँ गाँव, परिवार, गरीबी, सामंती मानसिकता, स्त्री-जीवन, बुजुर्गों की उपेक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा, न्याय और मानवीय करुणा एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रेमचंद अपने पात्रों पर फैसला सुनाने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करते हैं। वे जानते हैं कि मनुष्य कमजोर भी है और अच्छा बनने की क्षमता भी रखता है।
इसलिए मानसरोवर भाग 2 का सारांश केवल चौदह कहानियों की घटनाओं का संक्षेप नहीं है। यह भारतीय समाज के उस दौर की मानसिकता को समझने का अवसर है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चल रही थीं। “पंच परमेश्वर” न्याय की सीख देती है, “बड़े घर की बेटी” परिवार और त्याग का महत्व बताती है, “बूढ़ी काकी” बुजुर्गों की उपेक्षा पर चोट करती है, “शतरंज के खिलाड़ी” सामाजिक और राजनीतिक निष्क्रियता पर व्यंग्य करती है और “पिसनहारी का कुआँ” सेवा तथा लोककल्याण की शक्ति को सामने लाती है। इन अलग-अलग कथाओं को जोड़ने वाली सबसे मजबूत कड़ी मानवता है।
प्रेमचंद की भाषा सरल है, लेकिन उनके विचार गहरे हैं। यही कारण है कि Premchand की कहानियाँ, मानसरोवर भाग 2 का हिंदी सारांश, प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ और मानसरोवर भाग 2 का विश्लेषण आज भी विद्यार्थियों, हिंदी साहित्य के पाठकों और सामान्य पाठकों के लिए उपयोगी बने हुए हैं। यह संग्रह हमें केवल बीते हुए समाज की तस्वीर नहीं दिखाता, बल्कि हमारे अपने व्यवहार पर भी प्रश्न उठाता है—हम न्याय के समय कितने निष्पक्ष हैं, परिवार में कितने संवेदनशील हैं, कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और सफलता या प्रतिष्ठा मिलने पर हमारा स्वभाव कितना बदल जाता है। यही प्रश्न प्रेमचंद को कालजयी बनाते हैं और “मानसरोवर भाग 2” को हिंदी कहानी साहित्य का एक महत्वपूर्ण और बार-बार पढ़े जाने योग्य संग्रह बनाते हैं।
इस संग्रह को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात सामने आती है, वह है प्रेमचंद की मानवीय दृष्टि। उनके पात्र पूरी तरह अच्छे या बुरे नहीं होते। वे परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं, गलतियाँ करते हैं, स्वार्थी बनते हैं, पछताते हैं और कभी-कभी अपने भीतर छिपी अच्छाई को पहचान लेते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ पुराने समय की सामाजिक पृष्ठभूमि में होते हुए भी आज के पाठक को अपने आसपास की दुनिया से जुड़ी हुई लगती हैं।
“पंच परमेश्वर” इस संग्रह की सबसे प्रभावशाली कहानियों में से एक है। जुम्मन शेख और अलगू चौधरी गहरे मित्र हैं। दोनों के बीच धर्म या जाति से अधिक महत्वपूर्ण विश्वास और मित्रता है। लेकिन जब पंचायत में एक को दूसरे के विरुद्ध निर्णय देना पड़ता है, तो व्यक्तिगत संबंध और न्याय के बीच संघर्ष पैदा होता है। अलगू जब पंच बनता है तो जुम्मन के विरुद्ध निष्पक्ष फैसला देता है। बाद में जब जुम्मन को पंच बनने का अवसर मिलता है, तो वह भी मित्रता से ऊपर न्याय को रखता है। कहानी का मूल संदेश यह है कि पंच की कुर्सी पर बैठते ही मनुष्य को व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठना चाहिए। प्रेमचंद यहाँ ग्रामीण पंचायत के माध्यम से न्याय की नैतिक गरिमा को सामने रखते हैं।
“बड़े घर की बेटी” पारिवारिक संबंधों और समझदारी की कहानी है। आनंदी बड़े घर से आई हुई बहू है, लेकिन ससुराल की आर्थिक परिस्थितियाँ उसके मायके जैसी नहीं हैं। परिवार के छोटे-छोटे तनाव धीरे-धीरे विवाद में बदलते हैं और भाइयों के बीच मनमुटाव पैदा हो जाता है। आनंदी अपने व्यवहार और संयम से टूटते हुए परिवार को फिर जोड़ने की कोशिश करती है। प्रेमचंद बताते हैं कि घर को केवल धन नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और समझदारी भी संभालती है। कहानी में स्त्री को केवल घरेलू भूमिका में नहीं, बल्कि परिवार को जोड़ने वाली नैतिक शक्ति के रूप में देखा गया है।
“कजाकी” प्रेमचंद की करुण और भावुक कहानियों में गिनी जाती है। इसमें एक साधारण कर्मचारी और एक बच्चे के बीच विकसित होने वाला आत्मीय संबंध कहानी का केंद्र है। कजाकी आर्थिक रूप से साधारण व्यक्ति है, लेकिन उसके भीतर स्नेह, ईमानदारी और आत्मसम्मान की गहरी भावना है। कहानी यह दिखाती है कि सामाजिक हैसियत मनुष्य के हृदय की कीमत तय नहीं करती। प्रेमचंद छोटे आदमी के भीतर मौजूद बड़े मन को पहचानते हैं और पाठक को बताते हैं कि सच्ची इंसानियत पद और पैसे से कहीं बड़ी चीज है।
“शतरंज के खिलाड़ी” में प्रेमचंद व्यक्तिगत विलास और ऐतिहासिक पतन के बीच संबंध स्थापित करते हैं। मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली शतरंज खेलने में इतने डूबे हुए हैं कि उनके सामने बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का महत्व लगभग समाप्त हो जाता है। अवध के नवाब वाजिद अली शाह के शासन पर अंग्रेजी सत्ता का संकट मंडरा रहा है, लेकिन दोनों मित्र अपने खेल और निजी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। प्रेमचंद शतरंज के “राजा” को बचाने की कोशिश और वास्तविक राजनीतिक सत्ता के पतन के बीच एक तीखा व्यंग्य पैदा करते हैं। कहानी केवल दो आलसी सामंतों की कहानी नहीं है; यह उस मानसिकता की आलोचना है जिसमें व्यक्ति अपने निजी सुख में इतना डूब जाता है कि समाज और देश की बड़ी समस्याओं से आँखें फेर लेता है।
“बूढ़ी काकी” वृद्धावस्था, उपेक्षा और पारिवारिक संवेदनहीनता की मार्मिक कहानी है। बूढ़ी काकी ने अपनी संपत्ति रिश्तेदारों को दे दी, लेकिन उम्र बढ़ने के बाद वही लोग उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं। उन्हें भोजन और स्नेह जैसी बुनियादी चीजों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। कहानी में भूख केवल पेट की भूख नहीं है; यह सम्मान, अपनापन और प्रेम की भूख भी है। प्रेमचंद पाठक को यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि जिस बुजुर्ग ने जीवन भर परिवार के लिए दिया, उसके जीवन के अंतिम वर्षों में परिवार उसका कितना साथ देता है।
“नशा” मनुष्य के भीतर मौजूद सामाजिक अहंकार और वर्ग-बोध पर व्यंग्य करती है। कहानी का “नशा” केवल किसी पदार्थ का नहीं, बल्कि पद, प्रतिष्ठा और धन का नशा है। व्यक्ति जब अपने सामाजिक दर्जे को अपनी वास्तविक योग्यता समझने लगता है, तो उसका व्यवहार बदल जाता है। प्रेमचंद बड़ी सहजता से दिखाते हैं कि परिस्थितियाँ बदलते ही मनुष्य का वास्तविक चरित्र सामने आ जाता है। यह कहानी आज भी इसलिए प्रासंगिक लगती है क्योंकि आधुनिक समाज में भी पैसा, पद और सामाजिक प्रतिष्ठा व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
“सज्जनता का दंड” शीर्षक ही कहानी के व्यंग्य को स्पष्ट करता है। इसमें अच्छाई और ईमानदारी को हमेशा तत्काल पुरस्कार नहीं मिलता। कई बार सरल और सज्जन व्यक्ति ही चालाक लोगों का शिकार बन जाता है। प्रेमचंद इस विडंबना को उजागर करते हैं कि समाज में नैतिकता की बात करना आसान है, लेकिन वास्तव में सज्जन बने रहना कठिन। कहानी पाठक को यह प्रश्न देती है कि क्या ऐसी सामाजिक व्यवस्था उचित है जहाँ चालाकी सफल और ईमानदारी नुकसानदेह दिखाई देती है।
“आत्माराम” प्रेमचंद की हास्य और मानवीय स्वभाव से जुड़ी कहानियों में महत्वपूर्ण है। इसमें मनुष्य की इच्छाओं, कल्पनाओं और आत्म-संतोष की प्रवृत्ति को हल्के-फुल्के अंदाज में सामने लाया गया है। प्रेमचंद गंभीर सामाजिक विषयों के बीच हास्य का इस्तेमाल इसलिए करते हैं ताकि पाठक अपने ही व्यवहार को मुस्कराते हुए पहचान सके। कहानी का आनंद इसी बात में है कि इसमें उपदेश कम और जीवन की स्वाभाविक विडंबना अधिक दिखाई देती है।
“घासवाली” सामाजिक वर्ग, गरीबी और स्त्री के संघर्ष को केंद्र में रखती है। घास काटकर जीवन चलाने वाली स्त्री आर्थिक रूप से कमजोर है, लेकिन उसका आत्मसम्मान मजबूत है। प्रेमचंद गरीब पात्रों को दया के पात्र मात्र नहीं बनाते; वे उन्हें इच्छा, स्वाभिमान और निर्णय लेने की क्षमता वाले मनुष्य के रूप में चित्रित करते हैं। कहानी ग्रामीण समाज में आर्थिक और सामाजिक शक्ति के असंतुलन को उजागर करती है।
“पिसनहारी का कुआँ” त्याग और लोकहित की भावना की कहानी है। एक साधारण स्त्री की इच्छा और उसके परिश्रम से जुड़ा कुआँ आगे चलकर सामुदायिक उपयोग का प्रतीक बनता है। प्रेमचंद बताते हैं कि किसी व्यक्ति की सच्ची महानता उसकी संपत्ति में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसके जीवन से दूसरों को कितना लाभ मिला। यहाँ कुआँ केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि स्मृति, सेवा और मानवीय उदारता का प्रतीक बन जाता है।
“लाग-डाट” मानवीय प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और सामाजिक संबंधों की जटिलता को सामने लाती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि छोटी-सी बात कैसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाती है और लोग अपने अहंकार के कारण संबंधों को खराब कर बैठते हैं। कहानी में ग्रामीण जीवन की स्वाभाविक भाषा और व्यवहार के माध्यम से यह समझाया गया है कि मनुष्य अक्सर वास्तविक समस्या से अधिक अपने अहंकार की रक्षा करने में उलझा रहता है।
“परीक्षा” में नैतिकता और चरित्र की वास्तविक कसौटी सामने आती है। प्रेमचंद के लिए किसी व्यक्ति की अच्छाई उसके शब्दों से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थिति में किए गए उसके निर्णय से साबित होती है। जब स्वार्थ और कर्तव्य के बीच चुनाव करना पड़ता है, तभी चरित्र की असली परीक्षा होती है। यही विचार कहानी को केवल अपने समय की कथा न रहकर सार्वभौमिक मानवीय अनुभव बना देता है।
“क्रिकेट मैच” प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि का एक हल्का और व्यंग्यपूर्ण रूप प्रस्तुत करती है। आधुनिक खेल, सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावा और लोगों की मानसिकता कहानी में आपस में जुड़ते हैं। क्रिकेट यहाँ केवल खेल नहीं रहता; वह सामाजिक व्यवहार और नई संस्कृति के प्रभाव को देखने का माध्यम बन जाता है। प्रेमचंद हास्य के सहारे बताते हैं कि समाज किस तरह किसी नई चीज को अपनाते समय उसके वास्तविक अर्थ से अधिक उसके प्रदर्शन और प्रतिष्ठा पर ध्यान देने लगता है।
अंत में “भाड़े का टट्टू” व्यक्ति की उपयोगिता, स्वार्थ और सामाजिक व्यवहार की विडंबनाओं पर प्रकाश डालती है। “टट्टू” का रूपक ऐसे मनुष्य की ओर संकेत करता है जिसे दूसरे अपने उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करते हैं। कहानी में आर्थिक मजबूरी और सामाजिक संबंधों के बीच का तनाव दिखाई देता है। प्रेमचंद फिर वही सवाल उठाते हैं—क्या मनुष्य की कीमत उसके व्यक्तित्व से तय होती है या इस बात से कि वह दूसरों के कितने काम आ सकता है?
समग्र रूप से “मानसरोवर भाग 2” प्रेमचंद की कहानी-कला का ऐसा संसार है जहाँ गाँव, परिवार, गरीबी, सामंती मानसिकता, स्त्री-जीवन, बुजुर्गों की उपेक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा, न्याय और मानवीय करुणा एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रेमचंद अपने पात्रों पर फैसला सुनाने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करते हैं। वे जानते हैं कि मनुष्य कमजोर भी है और अच्छा बनने की क्षमता भी रखता है।
इसलिए मानसरोवर भाग 2 का सारांश केवल चौदह कहानियों की घटनाओं का संक्षेप नहीं है। यह भारतीय समाज के उस दौर की मानसिकता को समझने का अवसर है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चल रही थीं। “पंच परमेश्वर” न्याय की सीख देती है, “बड़े घर की बेटी” परिवार और त्याग का महत्व बताती है, “बूढ़ी काकी” बुजुर्गों की उपेक्षा पर चोट करती है, “शतरंज के खिलाड़ी” सामाजिक और राजनीतिक निष्क्रियता पर व्यंग्य करती है और “पिसनहारी का कुआँ” सेवा तथा लोककल्याण की शक्ति को सामने लाती है। इन अलग-अलग कथाओं को जोड़ने वाली सबसे मजबूत कड़ी मानवता है।
प्रेमचंद की भाषा सरल है, लेकिन उनके विचार गहरे हैं। यही कारण है कि Premchand की कहानियाँ, मानसरोवर भाग 2 का हिंदी सारांश, प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ और मानसरोवर भाग 2 का विश्लेषण आज भी विद्यार्थियों, हिंदी साहित्य के पाठकों और सामान्य पाठकों के लिए उपयोगी बने हुए हैं। यह संग्रह हमें केवल बीते हुए समाज की तस्वीर नहीं दिखाता, बल्कि हमारे अपने व्यवहार पर भी प्रश्न उठाता है—हम न्याय के समय कितने निष्पक्ष हैं, परिवार में कितने संवेदनशील हैं, कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और सफलता या प्रतिष्ठा मिलने पर हमारा स्वभाव कितना बदल जाता है। यही प्रश्न प्रेमचंद को कालजयी बनाते हैं और “मानसरोवर भाग 2” को हिंदी कहानी साहित्य का एक महत्वपूर्ण और बार-बार पढ़े जाने योग्य संग्रह बनाते हैं।
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Mansarovar in Hindi: Volume 2
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