Eidgah : Hindi
eBook
• INR 51.00
• Hindi
• 9788180320606
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9788180320606 |
| ASIN/SKU | B071LTLCHF |
| Book Format | eBook |
| Language | Hindi |
| List Price | INR 51.00 |
| Subject Code | FIC029000, JUV038000 |
| Book Code | BD00068267 |
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Discover Eidgah : Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320606, ASIN B071LTLCHF, under Literature and Fiction.
Book Description
ईदगाह प्रेमचंद की सबसे प्रसिद्ध और भावनात्मक कहानियों में से एक है, जो मानवीय संवेदनाओं, त्याग और निस्वार्थ प्रेम का अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। कहानी का केंद्र एक छोटे से अनाथ बालक हामिद है, जो अपनी बूढ़ी दादी अमीना के साथ अत्यंत गरीबी में जीवन बिताता है। ईद का दिन होने के बावजूद उनके घर में न नए कपड़े हैं, न स्वादिष्ट पकवान, फिर भी हामिद आशा और उत्साह से भरा हुआ अपने गाँव के बच्चों के साथ ईदगाह जाने के लिए निकल पड़ता है।
मेले में पहुँचकर दूसरे बच्चे खिलौने, मिठाइयाँ और झूले का आनंद लेते हैं, जबकि हामिद के पास केवल कुछ सिक्के होते हैं। वह अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है और सोच-समझकर एक ऐसा सामान खरीदने का निर्णय लेता है जो उसकी दादी के लिए वास्तव में उपयोगी हो। अंततः वह खिलौनों और मिठाइयों के बजाय एक चिमटा खरीदता है, क्योंकि उसने कई बार अपनी दादी को रोटी बनाते समय तवे से हाथ जलाते हुए देखा है। उसके लिए यह साधारण वस्तु प्रेम, जिम्मेदारी और त्याग का प्रतीक बन जाती है।
जब हामिद घर लौटकर चिमटा दादी को देता है, तो पहले वे निराश होती हैं कि बच्चा मेले से कोई खिलौना या मिठाई नहीं लाया। लेकिन जैसे ही उन्हें उसके निर्णय के पीछे छिपा स्नेह और चिंता समझ में आती है, उनकी आँखें भर आती हैं। यह क्षण कहानी का सबसे भावुक और प्रभावशाली हिस्सा बन जाता है।
ईदगाह केवल एक बालक की कथा नहीं, बल्कि निःस्वार्थ प्रेम, पारिवारिक स्नेह, संतोष और मानवीय मूल्यों का अमर संदेश है। प्रेमचंद ने सरल भाषा और गहरी संवेदनशीलता के माध्यम से यह दिखाया है कि सच्ची खुशी भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि दूसरों के सुख और कल्याण की चिंता करने में निहित होती है। यह कहानी आज भी पाठकों के हृदय को उतनी ही गहराई से स्पर्श करती है जितनी अपने प्रकाशन के समय करती थी।
मेले में पहुँचकर दूसरे बच्चे खिलौने, मिठाइयाँ और झूले का आनंद लेते हैं, जबकि हामिद के पास केवल कुछ सिक्के होते हैं। वह अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है और सोच-समझकर एक ऐसा सामान खरीदने का निर्णय लेता है जो उसकी दादी के लिए वास्तव में उपयोगी हो। अंततः वह खिलौनों और मिठाइयों के बजाय एक चिमटा खरीदता है, क्योंकि उसने कई बार अपनी दादी को रोटी बनाते समय तवे से हाथ जलाते हुए देखा है। उसके लिए यह साधारण वस्तु प्रेम, जिम्मेदारी और त्याग का प्रतीक बन जाती है।
जब हामिद घर लौटकर चिमटा दादी को देता है, तो पहले वे निराश होती हैं कि बच्चा मेले से कोई खिलौना या मिठाई नहीं लाया। लेकिन जैसे ही उन्हें उसके निर्णय के पीछे छिपा स्नेह और चिंता समझ में आती है, उनकी आँखें भर आती हैं। यह क्षण कहानी का सबसे भावुक और प्रभावशाली हिस्सा बन जाता है।
ईदगाह केवल एक बालक की कथा नहीं, बल्कि निःस्वार्थ प्रेम, पारिवारिक स्नेह, संतोष और मानवीय मूल्यों का अमर संदेश है। प्रेमचंद ने सरल भाषा और गहरी संवेदनशीलता के माध्यम से यह दिखाया है कि सच्ची खुशी भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि दूसरों के सुख और कल्याण की चिंता करने में निहित होती है। यह कहानी आज भी पाठकों के हृदय को उतनी ही गहराई से स्पर्श करती है जितनी अपने प्रकाशन के समय करती थी।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
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