Panch-Parmeshwar : Hindi
eBook
• INR 51.00
• Hindi
• 9788180320620
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9788180320620 |
| ASIN/SKU | B073HKCMK5 |
| Book Format | eBook |
| Language | Hindi |
| List Price | INR 51.00 |
| Subject Code | FIC029000, JUV038000 |
| Book Code | BD00068269 |
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Discover Panch-Parmeshwar : Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320620, ASIN B073HKCMK5, under Literature and Fiction, Indian Literature, Classic Indian Fiction.
Book Description
प्रेमचंद की कालजयी कहानी पंच-परमेश्वर न्याय, मित्रता और नैतिकता के आदर्शों को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी के केंद्र में जुम्मन शेख और अलगू चौधरी हैं, जो घनिष्ठ मित्र हैं और एक-दूसरे पर पूरा विश्वास रखते हैं। दोनों का संबंध इतना प्रगाढ़ है कि गाँव के लोग उनकी मित्रता का उदाहरण देते हैं। किंतु परिस्थितियाँ तब बदल जाती हैं जब जुम्मन की बूढ़ी खाला अपनी संपत्ति उसके नाम कर देती हैं और बदले में आजीवन देखभाल की अपेक्षा रखती हैं। समय बीतने के साथ जुम्मन और उसकी पत्नी उनका उचित सम्मान और पालन-पोषण करना बंद कर देते हैं। न्याय पाने के लिए खाला पंचायत बुलाती हैं और संयोगवश अलगू चौधरी को पंच चुना जाता है।
मित्रता और न्याय के बीच कठिन चुनाव का सामना करते हुए अलगू निष्पक्ष निर्णय देते हैं और खाला के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। इससे जुम्मन की मित्रता टूट जाती है और दोनों के संबंध कटु हो जाते हैं। कुछ समय बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि एक अन्य विवाद में जुम्मन स्वयं पंच बनते हैं। पंच के आसन पर बैठते ही उन्हें अपने कर्तव्य और न्याय की महत्ता का गहरा बोध होता है। वे व्यक्तिगत द्वेष को भुलाकर सत्य और न्याय के पक्ष में निर्णय देते हैं।
सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा में लिखी गई यह कहानी इस विश्वास को स्थापित करती है कि पंच का पद व्यक्ति को निष्पक्षता, ईमानदारी और धर्म का पालन करने की प्रेरणा देता है। पंच-परमेश्वर केवल दो मित्रों की कथा नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सच्चा न्याय रिश्तों, स्वार्थ और भावनाओं से ऊपर होता है। यही कारण है कि यह कहानी आज भी भारतीय साहित्य की सबसे प्रेरणादायक और प्रासंगिक रचनाओं में गिनी जाती है।
मित्रता और न्याय के बीच कठिन चुनाव का सामना करते हुए अलगू निष्पक्ष निर्णय देते हैं और खाला के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। इससे जुम्मन की मित्रता टूट जाती है और दोनों के संबंध कटु हो जाते हैं। कुछ समय बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि एक अन्य विवाद में जुम्मन स्वयं पंच बनते हैं। पंच के आसन पर बैठते ही उन्हें अपने कर्तव्य और न्याय की महत्ता का गहरा बोध होता है। वे व्यक्तिगत द्वेष को भुलाकर सत्य और न्याय के पक्ष में निर्णय देते हैं।
सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा में लिखी गई यह कहानी इस विश्वास को स्थापित करती है कि पंच का पद व्यक्ति को निष्पक्षता, ईमानदारी और धर्म का पालन करने की प्रेरणा देता है। पंच-परमेश्वर केवल दो मित्रों की कथा नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सच्चा न्याय रिश्तों, स्वार्थ और भावनाओं से ऊपर होता है। यही कारण है कि यह कहानी आज भी भारतीय साहित्य की सबसे प्रेरणादायक और प्रासंगिक रचनाओं में गिनी जाती है।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
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