Poos Ki Raat: Hindi
eBook
• INR 51.00
• Hindi
• 9788180320613
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9788180320613 |
| ASIN/SKU | B073MN8R3N |
| Book Format | eBook |
| Language | Hindi |
| List Price | INR 51.00 |
| Subject Code | FIC029000, JUV038000 |
| Book Code | BD00068270 |
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Discover Poos Ki Raat: Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320613, ASIN B073MN8R3N, under Literature and Fiction.
Book Description
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी पूस की रात भारतीय ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों, गरीबी और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण करती है। कहानी का मुख्य पात्र हल्कू एक गरीब किसान है, जो कड़ी मेहनत के बावजूद आर्थिक तंगी से कभी मुक्त नहीं हो पाता। पूस के महीने की कड़ाके की ठंड में उसे अपनी फसल की रखवाली के लिए खेत में रात बितानी पड़ती है, जबकि उसके पास ठंड से बचने के लिए पर्याप्त गर्म कपड़े या कंबल तक नहीं हैं। उसकी पत्नी मुन्नी चाहती है कि वे पहले अपने लिए कंबल खरीदें, लेकिन कर्ज़ चुकाने की मजबूरी उन्हें अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से भी समझौता करने पर विवश कर देती है।
रात के अंधेरे और हाड़ कंपा देने वाली ठंड में हल्कू अपने वफादार कुत्ते जबरा के साथ किसी तरह समय बिताने का प्रयास करता है। ठंड की यातना इतनी असहनीय हो जाती है कि वह आग तापने के लिए सूखे पत्ते जलाता है, फिर भी राहत नहीं मिलती। इसी बीच जंगली जानवर खेत में घुसकर उसकी फसल नष्ट कर देते हैं, परंतु हल्कू में उन्हें रोकने की शक्ति नहीं बचती। आश्चर्यजनक रूप से वह इस नुकसान में भी एक तरह की राहत महसूस करता है, क्योंकि अब उसे ऐसी कठोर रातों में खेत की रखवाली नहीं करनी पड़ेगी।
सरल, सहज और यथार्थपरक भाषा में लिखी गई यह कहानी केवल एक किसान की दयनीय स्थिति का चित्रण नहीं करती, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाती है, जहाँ मेहनतकश व्यक्ति अपनी बुनियादी ज़रूरतों से वंचित रह जाता है। पूस की रात मानवीय संघर्ष, विवशता और जीवन की कठोर सच्चाइयों को गहरी संवेदना के साथ प्रस्तुत करने वाली प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है।
रात के अंधेरे और हाड़ कंपा देने वाली ठंड में हल्कू अपने वफादार कुत्ते जबरा के साथ किसी तरह समय बिताने का प्रयास करता है। ठंड की यातना इतनी असहनीय हो जाती है कि वह आग तापने के लिए सूखे पत्ते जलाता है, फिर भी राहत नहीं मिलती। इसी बीच जंगली जानवर खेत में घुसकर उसकी फसल नष्ट कर देते हैं, परंतु हल्कू में उन्हें रोकने की शक्ति नहीं बचती। आश्चर्यजनक रूप से वह इस नुकसान में भी एक तरह की राहत महसूस करता है, क्योंकि अब उसे ऐसी कठोर रातों में खेत की रखवाली नहीं करनी पड़ेगी।
सरल, सहज और यथार्थपरक भाषा में लिखी गई यह कहानी केवल एक किसान की दयनीय स्थिति का चित्रण नहीं करती, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाती है, जहाँ मेहनतकश व्यक्ति अपनी बुनियादी ज़रूरतों से वंचित रह जाता है। पूस की रात मानवीय संघर्ष, विवशता और जीवन की कठोर सच्चाइयों को गहरी संवेदना के साथ प्रस्तुत करने वाली प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
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