Bade Ghar Ki Beti: Hindi

Premchand

eBook • INR 51.00 • Hindi • 9788180320637
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Publisher General Press
ISBN13 9788180320637
ASIN/SKU B073Q74RVZ
Book Format eBook
Language Hindi
List Price INR 51.00
Subject Code FIC029000, JUV038000
Book Code BD00068271

Discover Bade Ghar Ki Beti: Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320637, ASIN B073Q74RVZ, under Literature and Fiction, Children's Classic Fiction, Classic Fiction.

Book Description

बड़े घर की बेटी मुंशी प्रेमचंद की एक मार्मिक सामाजिक कहानी है, जो भारतीय पारिवारिक जीवन, मानवीय संबंधों और त्याग की भावना को अत्यंत सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी की नायिका आनंदी एक संपन्न परिवार की सुशिक्षित और संस्कारी बेटी है, जिसका विवाह एक साधारण लेकिन सम्मानित परिवार में होता है। विवाह के बाद वह अपने नए घर के वातावरण में पूरी निष्ठा और धैर्य के साथ स्वयं को ढाल लेती है। उसके विनम्र स्वभाव, समझदारी और परिवार के प्रति समर्पण से घर के सभी सदस्य प्रभावित होते हैं।

कहानी में मोड़ तब आता है जब परिवार के दो भाइयों के बीच एक छोटे से विवाद के कारण कटुता पैदा हो जाती है। अहंकार और क्रोध के कारण स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि परिवार के टूटने का संकट सामने आ खड़ा होता है। ऐसे कठिन समय में आनंदी अपनी बुद्धिमत्ता, सहनशीलता और उदार हृदय का परिचय देती है। वह किसी का पक्ष लेने के बजाय दोनों भाइयों के बीच की दूरी को प्रेम, धैर्य और समझदारी से कम करने का प्रयास करती है। उसके शांत व्यवहार और निस्वार्थ भाव से परिवार में फिर से विश्वास और अपनापन लौट आता है।

प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि परिवार की वास्तविक शक्ति धन या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि प्रेम, क्षमा, त्याग और आपसी सम्मान में निहित होती है। आनंदी का चरित्र भारतीय नारी के धैर्य, करुणा और नैतिक दृढ़ता का सशक्त प्रतीक बनकर उभरता है। बड़े घर की बेटी केवल एक पारिवारिक कथा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का ऐसा प्रेरक चित्रण है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक और हृदयस्पर्शी है जितना अपने समय में था।

Author Biography

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।

सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।

किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।

1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।

1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।

वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।

धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।

प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका

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