Namak Ka Daroga: Hindi
eBook
• INR 51.00
• English
• 9788180320651
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9788180320651 |
| ASIN/SKU | B073RLYST1 |
| Book Format | eBook |
| Language | English |
| List Price | INR 51.00 |
| Subject Code | FIC029000, JUV038000 |
| Book Code | BD00068272 |
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Discover Namak Ka Daroga: Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320651, ASIN B073RLYST1, under Literature and Fiction, Indian Writing, Short Stories.
Book Description
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी नमक का दरोगा ईमानदारी, नैतिकता और न्याय की शक्ति को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी का मुख्य पात्र मुंशी वंशीधर एक सिद्धांतवादी और कर्तव्यनिष्ठ युवक है, जिसे नमक विभाग में दरोगा के पद पर नियुक्त किया जाता है। उस समय नमक पर सरकारी नियंत्रण था और उसकी तस्करी आम बात थी। अपनी पहली ही महत्वपूर्ण ड्यूटी के दौरान वंशीधर का सामना प्रभावशाली और अत्यंत धनी व्यापारी पंडित अलोपीदीन से होता है, जो अवैध रूप से नमक ले जा रहा होता है। अपने धन और रसूख के बल पर वह वंशीधर को रिश्वत देकर मामले को दबाने का प्रयास करता है, लेकिन वंशीधर अपने सिद्धांतों से तनिक भी समझौता नहीं करता और कानून के अनुसार उसे गिरफ्तार कर लेता है।
हालाँकि अदालत में प्रभाव और सत्ता के कारण अलोपीदीन बच निकलता है, जबकि वंशीधर को अपनी ईमानदारी की कीमत पद और प्रतिष्ठा के रूप में चुकानी पड़ती है। फिर भी उसकी अडिग सत्यनिष्ठा अलोपीदीन के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। अंततः वह वंशीधर के चरित्र और कर्तव्यनिष्ठा से इतना प्रभावित होता है कि उसे अपने विशाल व्यापार का प्रबंधक बनने का प्रस्ताव देता है।
सरल, प्रभावशाली और यथार्थपरक भाषा में लिखी गई यह कहानी बताती है कि सच्ची ईमानदारी का मूल्य तत्काल भले ही न मिले, लेकिन उसका सम्मान अंततः अवश्य होता है। नमक का दरोगा केवल भ्रष्टाचार और नैतिक संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि यह इस विश्वास को भी मजबूत करती है कि सत्य, चरित्र और कर्तव्यनिष्ठा किसी भी धन-संपत्ति या बाहरी प्रभाव से कहीं अधिक मूल्यवान होते हैं।
हालाँकि अदालत में प्रभाव और सत्ता के कारण अलोपीदीन बच निकलता है, जबकि वंशीधर को अपनी ईमानदारी की कीमत पद और प्रतिष्ठा के रूप में चुकानी पड़ती है। फिर भी उसकी अडिग सत्यनिष्ठा अलोपीदीन के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। अंततः वह वंशीधर के चरित्र और कर्तव्यनिष्ठा से इतना प्रभावित होता है कि उसे अपने विशाल व्यापार का प्रबंधक बनने का प्रस्ताव देता है।
सरल, प्रभावशाली और यथार्थपरक भाषा में लिखी गई यह कहानी बताती है कि सच्ची ईमानदारी का मूल्य तत्काल भले ही न मिले, लेकिन उसका सम्मान अंततः अवश्य होता है। नमक का दरोगा केवल भ्रष्टाचार और नैतिक संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि यह इस विश्वास को भी मजबूत करती है कि सत्य, चरित्र और कर्तव्यनिष्ठा किसी भी धन-संपत्ति या बाहरी प्रभाव से कहीं अधिक मूल्यवान होते हैं।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
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