Shatranj Ke Khiladi: Hindi
eBook
• INR 51.00
• Hindi
• 9788180320675
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9788180320675 |
| ASIN/SKU | B073VXPGFK |
| Book Format | eBook |
| Language | Hindi |
| List Price | INR 51.00 |
| Subject Code | FIC029000, JUV038000 |
| Book Code | BD00068274 |
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Discover Shatranj Ke Khiladi: Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320675, ASIN B073VXPGFK, under Literature and Fiction.
Book Description
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी शतरंज के खिलाड़ी नवाबी संस्कृति, सामाजिक पतन और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों की उपेक्षा पर गहरा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कहानी का केंद्र अवध के दो रईस मित्र—मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रोशन अली—हैं, जिन्हें शतरंज खेलने का ऐसा जुनून है कि वे अपने परिवार, सामाजिक दायित्वों और देश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों तक से बेखबर हो जाते हैं। उनके लिए शतरंज केवल एक खेल नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण बन जाता है।
कहानी की पृष्ठभूमि उस समय की है जब अंग्रेज़ी हुकूमत धीरे-धीरे अवध पर अपना अधिकार स्थापित कर रही थी और नवाब वाजिद अली शाह का शासन संकट में था। लेकिन जहाँ पूरा प्रदेश एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, वहीं दोनों मित्र अपनी बिसात और मोहरों में इतने खोए रहते हैं कि उन्हें अपने आसपास घट रही घटनाओं का कोई बोध नहीं होता। घरेलू असंतोष, पारिवारिक उपेक्षा और राजनीतिक उथल-पुथल भी उनके इस मोह को तोड़ नहीं पाती। अंततः उनकी यही आसक्ति उन्हें ऐसी स्थिति में पहुँचा देती है, जहाँ उन्हें अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं का सामना करना पड़ता है।
सरल, प्रभावशाली और व्यंग्यपूर्ण भाषा में लिखी गई यह कहानी केवल दो शतरंज प्रेमियों की कथा नहीं है, बल्कि उस समाज का दर्पण है जो अपने वास्तविक कर्तव्यों से विमुख होकर तुच्छ मनोरंजन में उलझ जाता है। शतरंज के खिलाड़ी सत्ता, समाज और व्यक्ति के संबंधों पर गंभीर प्रश्न उठाती है तथा यह संदेश देती है कि जब लोग अपने उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ लेते हैं, तो उसका दुष्परिणाम केवल उनके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को प्रभावित करता है।
कहानी की पृष्ठभूमि उस समय की है जब अंग्रेज़ी हुकूमत धीरे-धीरे अवध पर अपना अधिकार स्थापित कर रही थी और नवाब वाजिद अली शाह का शासन संकट में था। लेकिन जहाँ पूरा प्रदेश एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, वहीं दोनों मित्र अपनी बिसात और मोहरों में इतने खोए रहते हैं कि उन्हें अपने आसपास घट रही घटनाओं का कोई बोध नहीं होता। घरेलू असंतोष, पारिवारिक उपेक्षा और राजनीतिक उथल-पुथल भी उनके इस मोह को तोड़ नहीं पाती। अंततः उनकी यही आसक्ति उन्हें ऐसी स्थिति में पहुँचा देती है, जहाँ उन्हें अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं का सामना करना पड़ता है।
सरल, प्रभावशाली और व्यंग्यपूर्ण भाषा में लिखी गई यह कहानी केवल दो शतरंज प्रेमियों की कथा नहीं है, बल्कि उस समाज का दर्पण है जो अपने वास्तविक कर्तव्यों से विमुख होकर तुच्छ मनोरंजन में उलझ जाता है। शतरंज के खिलाड़ी सत्ता, समाज और व्यक्ति के संबंधों पर गंभीर प्रश्न उठाती है तथा यह संदेश देती है कि जब लोग अपने उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ लेते हैं, तो उसका दुष्परिणाम केवल उनके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को प्रभावित करता है।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
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