Ramleela: Hindi
eBook
• INR 51.00
• Hindi
• 9788180320682
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9788180320682 |
| ASIN/SKU | B073WH1YV2 |
| Book Format | eBook |
| Language | Hindi |
| List Price | INR 51.00 |
| Subject Code | FIC029000, JUV038000 |
| Book Code | BD00068275 |
Discover Ramleela: Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320682, ASIN B073WH1YV2, under Literature and Fiction.
Book Description
प्रेमचंद की संवेदनशील कहानी रामलीला भारतीय समाज, लोकसंस्कृति और मानवीय मूल्यों का अत्यंत जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती है। कहानी का केंद्र एक छोटे कस्बे में आयोजित होने वाली रामलीला है, जहाँ धार्मिक आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन जाता है। एक बालक की दृष्टि से आगे बढ़ती यह कथा रामलीला के पात्रों, मंच की तैयारियों और उससे जुड़े लोगों के जीवन को बड़ी आत्मीयता से सामने लाती है।
कहानी में प्रेमचंद यह दिखाते हैं कि मंच पर भगवान राम, लक्ष्मण और अन्य पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकार साधारण जीवन जीने वाले सामान्य लोग हैं, जो आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक संघर्षों के बीच भी अपनी भूमिका पूरी निष्ठा से निभाते हैं। बालक की निष्कपट श्रद्धा उसे मंच और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर समझने में समय लेती है, किंतु धीरे-धीरे वह जानता है कि महानता केवल वेशभूषा या अभिनय में नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार में निहित होती है। इस अनुभव के माध्यम से उसके भीतर जीवन, आदर्शों और मानवीय संबंधों के प्रति एक नई समझ विकसित होती है।
सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा में लिखी गई रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन का वर्णन नहीं है, बल्कि यह बचपन की मासूम भावनाओं, समाज की वास्तविकताओं और आदर्शों के महत्व पर गहरा प्रकाश डालती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि सच्चे नैतिक मूल्य मंच पर निभाए जाने वाले पात्रों से अधिक हमारे दैनिक जीवन के आचरण में दिखाई देते हैं। यही संवेदनशील दृष्टि इस कहानी को आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक बनाती है।
कहानी में प्रेमचंद यह दिखाते हैं कि मंच पर भगवान राम, लक्ष्मण और अन्य पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकार साधारण जीवन जीने वाले सामान्य लोग हैं, जो आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक संघर्षों के बीच भी अपनी भूमिका पूरी निष्ठा से निभाते हैं। बालक की निष्कपट श्रद्धा उसे मंच और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर समझने में समय लेती है, किंतु धीरे-धीरे वह जानता है कि महानता केवल वेशभूषा या अभिनय में नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार में निहित होती है। इस अनुभव के माध्यम से उसके भीतर जीवन, आदर्शों और मानवीय संबंधों के प्रति एक नई समझ विकसित होती है।
सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा में लिखी गई रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन का वर्णन नहीं है, बल्कि यह बचपन की मासूम भावनाओं, समाज की वास्तविकताओं और आदर्शों के महत्व पर गहरा प्रकाश डालती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि सच्चे नैतिक मूल्य मंच पर निभाए जाने वाले पात्रों से अधिक हमारे दैनिक जीवन के आचरण में दिखाई देते हैं। यही संवेदनशील दृष्टि इस कहानी को आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक बनाती है।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
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