Sujan Bhagat: Hindi
eBook
• INR 51.00
• Hindi
• 9788180320729
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| Publisher | General Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9788180320729 |
| ASIN/SKU | B073X6KPSJ |
| Book Format | eBook |
| Language | Hindi |
| List Price | INR 51.00 |
| Subject Code | FIC029000, JUV038000 |
| Book Code | BD00068276 |
Discover Sujan Bhagat: Hindi by Premchand. This book is published by General Press in eBook format, ISBN 9788180320729, ASIN B073X6KPSJ, under Literature and Fiction.
Book Description
मुंशी प्रेमचंद की कहानी सुजान भगत भारतीय ग्रामीण जीवन और पारिवारिक रिश्तों की एक बेहद मार्मिक तस्वीर पेश करती है।
कहानी का मुख्य पात्र सुजान एक अत्यंत परिश्रमी किसान है। अपनी दिन-रात की मेहनत से वह खूब धन-धान्य कमाता है। सफलता और बढ़ती उम्र के कारण समाज में उसका सम्मान बढ़ता है और लोग उसे 'भगत' कहकर बुलाने लगते हैं। भगत बनने के बाद सुजान का मन पूजा-पाठ और दान-धर्म में ज्यादा लगने लगता है और वह खेती के कामों से दूर हो जाता है। इसका फायदा उठाकर उसके बेटे घर और खेती का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लेते हैं। जो बेटे कभी उसके सामने सिर नहीं उठाते थे, वही अब उसे घर का एक बेकार और बोझ समझने लगते हैं।
एक दिन जब सुजान एक भिक्षुक को अनाज देने लगता है, तो उसका बेटा उसे अपमानित करता है और अनाज देने से रोक देता है। यह घटना सुजान के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुँचाती है। उसे एहसास होता है कि दुनिया में सम्मान केवल उसी का है जो मेहनत करता है। अपने खोए हुए सम्मान को वापस पाने के लिए सुजान फिर से खेतों की ओर लौटता है। वह अपने युवा बेटों से भी ज्यादा कठोर परिश्रम करता है।
उसकी अथक मेहनत से उस साल खेत में बहुत अच्छी फसल होती है। यह देखकर उसके बेटे हैरान रह जाते हैं और उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है। अंततः सुजान फिर से अपने घर का मुखिया बन जाता है।
कहानी का मुख्य पात्र सुजान एक अत्यंत परिश्रमी किसान है। अपनी दिन-रात की मेहनत से वह खूब धन-धान्य कमाता है। सफलता और बढ़ती उम्र के कारण समाज में उसका सम्मान बढ़ता है और लोग उसे 'भगत' कहकर बुलाने लगते हैं। भगत बनने के बाद सुजान का मन पूजा-पाठ और दान-धर्म में ज्यादा लगने लगता है और वह खेती के कामों से दूर हो जाता है। इसका फायदा उठाकर उसके बेटे घर और खेती का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लेते हैं। जो बेटे कभी उसके सामने सिर नहीं उठाते थे, वही अब उसे घर का एक बेकार और बोझ समझने लगते हैं।
एक दिन जब सुजान एक भिक्षुक को अनाज देने लगता है, तो उसका बेटा उसे अपमानित करता है और अनाज देने से रोक देता है। यह घटना सुजान के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुँचाती है। उसे एहसास होता है कि दुनिया में सम्मान केवल उसी का है जो मेहनत करता है। अपने खोए हुए सम्मान को वापस पाने के लिए सुजान फिर से खेतों की ओर लौटता है। वह अपने युवा बेटों से भी ज्यादा कठोर परिश्रम करता है।
उसकी अथक मेहनत से उस साल खेत में बहुत अच्छी फसल होती है। यह देखकर उसके बेटे हैरान रह जाते हैं और उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है। अंततः सुजान फिर से अपने घर का मुखिया बन जाता है।
Author Biography
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही ग्राम में हुआ था। उनके पिता अजायब राय पोस्ट ऑफ़िस में क्लर्क थे। वे अजायब राय व आनन्दी देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाँ बचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे स्थान पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
सात साल की उम्र से उन्होंने एक मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत की जहाँ उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठ साल के थे तभी लम्बी बीमारी के बाद आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतु प्रेमचंद को नई माँ से कम ही प्यार मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।
किताबों में जाकर उन्हें सुकून मिला। उन्होंने कम उम्र में ही उर्दू, फ़ारसी और अँग्रेज़ी साहित्य की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी के क्वींस कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
1895 में पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। लड़की एक सम्पन्न ज़मीदार परिवार से थी और आयु में उनसे बढ़ी थी। प्रेमचंद ने पाया कि वह स्वभाव से बहुत झगड़ालू है और कोई ख़ास सुंदर भी नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन करते हुए 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं–श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1897 में अजायब राय भी चल बसे। प्रेमचंद ने जैसे-तैसे दूसरे दर्जे से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उन्होंने प्राइवेट से इंटर व बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
वाराणसी के एक वकील के बेटे को 5 रु. महीना पर ट्यूशन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कुछ समय बाद 18 रु. महीना की स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई। सन् 1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को एक अच्छा मकान भी मिल गया।
धनपत राय ने सबसे पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शुरू किया। बाद में उन्होंने हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखा। प्रेमचंद ने 14 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय व संस्मरण आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रेमचंद ने मुंबई में रहकर फ़िल्म ‘मज़दूर’ की पटकथा भी लिखी।
प्रेमचंद काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका
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